उत्तर प्रदेश जिला फिरोजाबाद छाणी परंपरा के सप्तम पट्टाधीश आचार्य श्री 108 विवेक सागर महाराज ने श्री 108 रत्नत्रय दिगंबर जैन मंदिर नसिया में किया प्रवचन बिना आहार दान के मोक्ष मार्ग तक नहीं चल सकता | (  वरिष्ठ ब्यूरो प्रमुख सन्नेश कुमार गुप्ता के साथ राजेश शर्मा की खास रिपोर्ट )

 

( फिरोजाबाद छाणी परंपरा के सप्तम पट्टाधीश आचार्य श्री 108 विवेक सागर महाराज ने श्री 108 रत्नत्रय दिगंबर जैन मंदिर नसिया में किया प्रवचन बिना आहार दान के मोक्ष मार्ग तक नहीं चल सकता )

उत्तर प्रदेश जिला फिरोजाबाद छाणी परम्परा के सप्तम पट्टाधीश आचार्य श्री108विवेकसागर महाराज ने श्री1008रत्नत्रय दि. जैन मंदिर नशिया में प्रवचन करते हुए कहा कि- रयणसार ग्रंथ में रत्नों का सार भरा हुआ है। सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र यह सभी रत्न है और श्रावक भी मोक्ष मार्गी होता है क्योंकि वह मोक्ष मार्ग में आरूढ़ मुनियों की चर्या में सहयोगी होता है | धर्म को बढ़ाने की प्रेरणा देते हुए आचार्य भगवान कहते हैं के सुपात्र को दान देने से वज्रदण्ड चक्रवर्ती प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ बने और राजा श्रीषेण सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ बने। आहार दान का इतना उत्कृष्ट फल इसलिए है क्योंकि आहार से ही मुनिराज अपने व्रतों को भली-भांति पालन करते हैं इसीलिए श्रावक को परंपरा से मोक्ष मार्गी कहा गया । साधु की निर्दोष चर्या होती है उसमें श्रावक निमित्त बनता है। आहार के समय श्रावकों के वचन कि हम सुबह 4:00 बजे से लगे हुए हैं या कि महाराज हमने यह तो आपके लिए बनाया था इस प्रकार के वचनों से साधु अंतराय भी कर सकते हैं राम और सीता जी वनवास के समय प्रतिदिन आहार देते थे और पक्षी जटायु उन्हें आहार देते हुए देखता था उस पक्षी को जाति स्मरण हुआ और उसने सोचा की पूर्व जन्म में हमने माया चारी की जिसके फलस्वरूप यह त्रियंच पर्याय मिली है इस वर्तमान समय में हम लोग भी बहुत चीटिंग करते हैं इसका फल हमें खुद सोचना चाहिए जैन दर्शन में कृत ,कारित, अनुमोदना यह तीन प्रकार से कार्य बताए गए हैं ,तीनों का ही फल अलग-अलग है केवल अनुमोदना मात्र से फल की पूर्ण प्राप्ति नहीं होगी । अनुमोदना उनके लिए है जो कार्य करने में समर्थ नहीं है जब आप समर्थ हैं तो आहार दान देना चाहिए। जैनेत्तर समाज या अन्य जो कि आहार दान के समर्थ नहीं है अनुमोदना उनके लिए है। सुपात्र को दान देने का क्या फल है इस के संदर्भ में आचार्य कुंदकुंद देव रयणसार ग्रंथ की 21वीं गाथा में कहते हैं उत्तम कुल, उत्तम रूप, उत्तम लक्षण, उत्तम बुद्धि, उत्तम शिक्षा, उत्तम स्वभाव, उत्तम गुण, उत्तम चरित्र और सकल सुखों का अनुभव और वैभव यह सब सुपात्र दान का फलस्वरुप ही मिलते हैं। सुपात्र को आहार दान देने की महिमा के संदर्भ में आचार्य श्री बताते हैं सुपात्र को दान देने से ही तीर्थंकर भगवान का मार्ग अर्थात् मोक्ष मार्ग अनवरत चल सकता है। आचार्य सकल कीर्ति जी सूर्य प्रकाश ग्रंथ में कहते हैं कि पंचम काल में मनुष्य हीन सहनन वाले होंगे और धर्म की साधना आराधना के लिए भोजन की आवश्यकता होगी इसीलिए पंचम काल में मनुष्य को अन्न का कीड़ा कहा गया है। और शरीर की स्थिति को सुदृढ़ रखने के लिए आहार की आवश्यकता है, बिना आहार दान के मोक्ष मार्ग तक नहीं चल सकता अतः आहार दान मोक्ष मार्ग में परंपरा से निमित्त कारण है।तीर्थंकर ऋषभदेव भी इस बात को जानते थे इसीलिए उन्होंने आहार दान के मार्ग को प्रशस्त किया यह आहार दान परंपरा से चला आ रहा है इसी क्रम में आचार्य भगवान कहते हैं के सम्यक दृष्टि जीव आहार दान से मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ता है।
अतः सुपात्र को दान देकर हमें मोक्ष मार्ग पर बढ़ना चाहिए।

(  वरिष्ठ ब्यूरो प्रमुख सन्नेश कुमार गुप्ता की खास रिपोर्ट )

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